माँ के ममता प्यार की, जब चलेंगी आंधियाँ।
काल के वट वृक्ष ढहकर, धूल में मिल जायेंगे।।

मैं प्रचीनकालीन ऋषि परम्परा की कड़ी हूँ एवं मूल प्रकृतिसत्ता से पूर्णतः एकाकार हूँ, इसलिये प्रकृति में परिवर्तन की क्षमता रखता हूँ एवं किसी भी प्राकृतिक घटना को कम कर सकता हूँ या टाल भी सकता हूँ।

स्थूल शरीर के वशीभूत अपनी चेतना को मत करो। नश्वर काया का उपयोग कर, चेतनावानों का जीवन जियो। प्रकृतिसत्ता से मांगना है तो भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति माँगो। मानव का प्रथम कर्त्तव्य, अपनी आत्मचेतना को प्राप्त कर अपने ‘‘मैं‘‘ के सहज स्वरुप को जानना है।

धन बल, जन बल, मान बल, ये सब ही हैं तुच्छ।
यदि जीवन में प्राप्त हो, शक्ति तप बल श्रेष्ठ।।